Solar Promises in Parched Fields: Kya PM-KUSUM Hai India Ki Chupke Se Krishi Kranti?

Solar Promises in Parched Fields: Kya PM-KUSUM Hai India Ki Chupke Se Krishi Kranti?

आजकल जब भारत के जलवायु और ऊर्जा की बात होती है, तो लोग थार डेजर्ट के बड़े सोलर फार्म्स या गुजरात के गीगावॉट घोषणाओं की चर्चा करते हैं। लेकिन असली बदलाव शायद चुपचाप गांवों के खेतों में हो रहा है – बोरवेल, ट्यूबवेल और पुराने ट्रांसफॉर्मर शेड्स के पास।

PM-KUSUM योजना, जो 2019 में शुरू हुई थी, सिर्फ सोलर पावर की बात नहीं करती। यह किसानों को ऊर्जा उपभोक्ता से ऊर्जा उत्पादक बनाने की कोशिश है। यह भारतीय कृषि की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है। सवाल यह है – क्या यह वाकई काम कर रही है?

योजना का विचार और डिजाइन क्या है?

दशकों से भारतीय कृषि में बिजली एक वित्तीय ब्लैक होल बनी हुई है। राज्य किसानों को मुफ्त या बहुत सस्ती बिजली देते हैं, जो राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। इससे groundwater का अत्यधिक दोहन होता है और distribution companies (DISCOMs) दिवालिया हो जाती हैं। साथ ही, लाखों diesel pumps खेतों में चलते हैं, जो carbon छोड़ते हैं और ग्रामीण आय को नुकसान पहुंचाते हैं।

PM-KUSUM इस चक्र को तोड़ने की कोशिश करती है। इसका डिजाइन सरल लगता है, लेकिन जटिल है:

Component A: किसान और सहकारी समितियां छोटे decentralised solar plants (2 MW तक) बना सकें और बनी हुई बिजली DISCOMs को बेच सकें।

Component B: diesel irrigation pumps की जगह stand-alone solar pumps लगाए जाएं।

Component C: मौजूदा grid-connected pumps पर solar panels जोड़े जाएं ताकि किसान अतिरिक्त बिजली grid में बेच सकें।

फंडिंग मॉडल संतुलित है – केंद्र + राज्य से 60% subsidy, 30% बैंक लोन, और किसान का सिर्फ 10% योगदान। यह subsidy को capital में बदलने, revenue outflow को asset creation में बदलने और climate goals को ग्रामीण आय समर्थन से जोड़ने का तरीका है।

क्या इसे प्राथमिकता मिल रही है?

New & Renewable Energy Ministry अभी भी इसे सबसे ज्यादा फंड देती है, भले ही अन्य वित्तीय दबाव हों। डेडलाइन मार्च 2026 तक बढ़ाई गई है, यानी योजना खत्म नहीं हो रही बल्कि जारी है। अब यह Agriculture Infrastructure Fund जैसे बड़े कार्यक्रमों के साथ जुड़ गई है – यह दिखाता है कि सरकार इसे अस्थायी प्रयोग नहीं, बल्कि संरचनात्मक बदलाव मानती है।

राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में feeder-level solarisation (Component C) तेजी से चल रहा है – पूरे agricultural feeders को solarise करने का लक्ष्य है, सिर्फ व्यक्तिगत pumps से ज्यादा system-level transformation।

लेकिन कागज पर प्राथमिकता और जमीन पर क्रियान्वयन में अंतर होता है।

अब तक के आंकड़े क्या कहते हैं?

सरकार के ताजा अपडेट के अनुसार 9 लाख से ज्यादा standalone solar pumps लग चुके हैं। PM-KUSUM के तहत कुल renewable capacity 10 GW से ज्यादा हो चुकी है, लेकिन मूल पूर्ण लक्ष्य से अभी काफी पीछे है।

राजस्थान में बड़े पैमाने पर solar feeder प्रोजेक्ट चल रहे हैं। लेकिन क्रेडिट समस्याएं, DISCOMs की अनिच्छा और प्रशासनिक देरी ने क्रियान्वयन को धीमा किया है। योजना पायलट स्टेज से निकल चुकी है, लेकिन systemic tipping point तक नहीं पहुंची है।

तीन बड़े चुनौतियां जो सामने हैं

PM-KUSUM तीन विवादास्पद क्षेत्रों के बीच में है:

कृषि लोकलुभावनवाद – मुफ्त बिजली की राजनीति।

ऊर्जा क्षेत्र सुधार – DISCOMs की वित्तीय स्थिति।

groundwater प्रबंधन – अत्यधिक दोहन का खतरा।

solar pumps से दिन में भरोसेमंद सिंचाई मिलती है, जो किसानों के लिए बड़ी राहत है (क्योंकि रात की अनियमित सप्लाई पुरानी शिकायत थी)। लेकिन अगर groundwater नियमन साथ में न हो तो यह एक पर्यावरण समस्या को हल करते हुए दूसरी बड़ी समस्या पैदा कर सकता है।

DISCOMs भी समस्या बन जाती हैं – वे वित्तीय रूप से कमजोर होते हुए decentralised solar power को तय कीमत पर खरीदने से हिचकिचाती हैं। मजबूत प्रशासन वाले राज्यों में ही यह सुचारु रूप से चल रहा है।

पहुंच और निष्पक्षता का मुद्दा

योजना की subsidy वितरण निष्पक्ष लगती है, लेकिन डिजाइन में खामियां हैं। 10% किसान योगदान छोटा लगता है, लेकिन छोटे/सीमांत किसानों के लिए – जिनके पास सही land title नहीं, बैंक पहुंच नहीं – यह भी बाधा बन जाता है।

भूमिहीन किरायेदार या अनौपचारिक किसान Component A से पूरी तरह बाहर रह जाते हैं क्योंकि land ownership जरूरी है। Component C में भी ज्यादा आय सिर्फ बड़े landowners को मिलती है जिनके पास शक्तिशाली pumps हैं।

निष्पक्षता ज्यादातर राज्य-स्तरीय लक्ष्यीकरण और जवाबदेही पर निर्भर करती है।

जलवायु लक्ष्य बनाम ग्रामीण जीवन

यह योजना भारत के अंतरराष्ट्रीय climate commitments से सीधे मेल खाती है – decentralised renewables बढ़ाना, diesel उपयोग कम करना, non-fossil capacity लक्ष्य हासिल करना।

लेकिन इसका असली मतलब कुछ और है: किसान को subsidy का निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं, ऊर्जा क्रांति का सक्रिय भागीदार बनाना। कृषि विद्युतीकरण का उद्देश्य “मुफ्त बिजली” से बदलकर “उत्पादक संपत्ति” बन जाता है।

अगर groundwater संरक्षण और निष्पक्ष पहुंच के उपाय साथ में जोड़े जाएं, तो PM-KUSUM दशक की सबसे महत्वपूर्ण ग्रामीण नीति बन सकती है।

क्या यह वाकई चुपके की क्रांति है?

ऊर्जा परिवर्तन की बात गीगावॉट और बड़े निवेश से होती है। लेकिन PM-KUSUM की कहानी अलग है – बोरवेल के ऊपर solar panels, दिन भर पानी देना, अतिरिक्त बिजली कमजोर ग्रामीण grids में जाना।

यह नाटकीय नहीं है, धीरे-धीरे है – तकनीकी, प्रशासनिक और धीमी। लेकिन अगर सफल हुई तो बड़े solar parks से ज्यादा disruptive हो सकती है।

भारत के सूखे इलाकों में climate policy अमूर्त नहीं है – यह फसल चक्रों, pump घंटों और groundwater गहराई से मापी जाती है। PM-KUSUM की विरासत सम्मेलन कक्षों में नहीं, बल्कि किसानों के रोजमर्रा के हिसाब-किताब में तय होगी।

अगर यह आर्थिक व्यवहार्यता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक निष्पक्षता का संतुलन बना पाई, तो यह भारत की चुपके से कृषि क्रांति बन सकती है।

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